उपभोक्तावादी संस्कृति PPT in Hindi

उपभोक्ता वादी संस्कृति के चलते विज्ञापनों के मकडज़ाल में फंसकर आज की युवा पीढ़ी दिग्भ्रमित होती जा रही है। शरीर पंचभौतिक तत्वों से मिलकर बना है तथा इसे योग के अनुशासन से ही ठीक रखा जा सकता है परंतु आज विज्ञापनों के फेर में सौंदर्य प्रसाधनों तथा स्वास्थ्य वर्धक पेयों के नाम पर रासायनिक मिश्रणों के उपयोग से न केवल अपनी त्वचा का नाश कर रहे हैं अपितु गंभीर बीमारियों से भी ग्रसित होते जा रहे हैं। मानसिक गुलामी के चलते हमने अपनी दिनचर्या को भी बिगाड़ दिया है। आज दुनिया के अधिकांश देश जहां योग की पद्घति को अपना कर अपना जीवन सुधार रहे हैं वहीं हम आज भी योग का लाभ लेने में संकोच कर रहे हैं।
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